30 Best Mirza Ghalib Ki Shayari

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इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना। दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।

दिल से तेरी निगाह जि गर तक उतर गई। दोनों को इक अदा में रज़ामंद कर गई।

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक। कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक।

तेरे वादे पर जिये हम तो यह जान,झूठ जाना कि ख़ुशी से मर न जाते अगर एतबार होता।

तुम अपने शिकवे की बातें न खोद खोद के पूछो हज़र करो मिरे दिल से कि उस में आग दबी है।

तू ने कसम मय-कशी की खाई है ‘ग़ालिब’ तेरी कसम का कुछ एतिबार नही है।

मोहब्बत में नही फर्क जीने और मरने का उसी को देखकर जीते है जिस ‘काफ़िर’ पे दम निकले।

मगर लिखवाए कोई उस को खत तो हम से लिखवाए हुई सुब्ह और घरसे कान पर रख कर कलम निकले।

मरते है आरज़ू में मरने की मौत आती है पर नही आती, काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’ शर्म तुमको मगर नही आती।

कहाँ मयखाने का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहाँ वाइज पर इतना जानते है कल वो जाता था के हम निकले।

बना कर फकीरों का हम भेस ग़ालिब तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते है।

कितना ख़ौफ होता है शाम के अंधेरों में। पूछ उन परिंदों से जिनके घर नहीं होते।

तेरे वादे पर जिये हम, तो यह जान झूठ जाना, कि ख़ुशी से मर न जाते, अगर एतबार होता।

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले। बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे। कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और।

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता। डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता।

दर्द जब दिल में हो तो दवा कीजिए। दिल ही जब दर्द हो तो क्या कीजिए।

हाथों की लकीरों पे मत जा ऐ गालिब। नसीब उनके भी होते हैं जिनके हाथ नहीं होते।

वाइज़!! तेरी दुआओं में असर हो तो मस्जिद को हिलाके देख। नहीं तो दो घूंट पी और मस्जिद को हिलता देख।

नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू को। ये लोग क्यूँ मेरे ज़ख़्मे जिगर को देखते हैं।

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रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल। जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी। तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है।

हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है। वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता।

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़। वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।

काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’। शर्म तुम को मगर नहीं आती।

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना। दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।

इश्क़ पर जोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’। कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे।

दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई। दोनों को इक अदा में रज़ामंद कर गई।

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ। मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ।

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक। कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक। – mirza ghalib

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