49+ Best Manzil Shayari – (मंजिल की तलाश शायरी)

49+ Best Manzil Shayari – (मंजिल की तलाश शायरी)
Manzil Shayari
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1- जहाँ हर ताली तेरे लिए होगी वो महफ़िल भी मिलेगी, तू चल तो सही मंज़िल भी मिलेगी।

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2- मेहनत कर भूखे पेट सो लेना मंज़ूर है मुझे, ये बैठ कर खाना मुझे हज़म नहीं होगा।

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3- ये चश्में ख्वाहिशों के मुझे कहीं खोने नहीं देते, आराम क्या करू ये ख़्वाब मुझे सोने नहीं देते।

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4- तानों की तारें टूट कर तार-तार हो जाएगी, मेरी एक जीत से उनकी हार हो जाएगी।

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5- ख्वाहिशें कितनी बाकी है ये पूछना मत मुझसे, मैं ख्वाहिशें करते वक़्त गिनता नहीं हूँ बस ये याद रखना।

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6- जब नज़्दीकियाँ चाहते हो तो दूरी क्यों रखते हो, जब ख्वाहिशें पूरी करते हो तो कोशिशें अधूरी क्यों करते हो।

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7- आज हार तो कल जीत मिलेगी, ज़िन्दगी भूल भुलैया है यहाँ हर मोड़ पर सीख मिलेगी।

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8- नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही नहीं विसाल मयस्सर तो आरजू ही सही।

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9- भावनाओं में बहने से नहीं खुशियां खुद को रोकने से मिलती है, मंज़िलें सोचने से नहीं खोजने से मिलती है।

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10- ज़िन्दगी की जानकारी रोज़ कुछ नया जानने से मिलती है, हार हारने से नहीं हार मानने से मिलती है।

11- उठ हर दफा गिर कर, ख्वाहिशें नहीं दोस्त कोशिश कर।

12- मंजिल तो मिल गई अब सफ़र कैसा, जब ख़ुदा तेरे साथ है फिर डर कैसा।

13- जिसके हाथों में हुनर होता है वो मंज़िल पाने के लिए लकीरों पर चलने का मोहताज नहीं होता।

14- सब कुछ तेरे हाथों में होगा पर पहले उस लायक कहला तो सही, देख ऊपर आसमान बहुत बड़ा है तू उड़ने के लिए पंख फैला तो सही।

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15- कांटें भी उसी के हक़ में होते है जिसके आँगन में गुलाब की कलियाँ खिलती है, मुश्किलें भी उसे ही मिलती है जिसे मंज़िल मिलती है।

16- आराम की जिंदगी आज कल मुश्किल मिलती है, किसी के पीछे चल कर ना रास्ते मिलते हैं ना मंज़िलें मिलती है।

17- मंज़िलें मिलेंगी बस रास्तों की परख रख, एक दिन सब कुछ तेरा होगा बस थोड़ा सब्र रख।

18- कितना भी आगे जाना हो चलना पीछे से ही पड़ता है, कितना भी ऊपर क्यों ना जाना हो उड़ना नीचे से ही पड़ता है।

19- मंज़िल मिले ना मिले मुक़द्दर की बात है पर हम कोशिश भी ना करें ये तो गलत बात है।

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20- वो आँखें ही क्या जो सपना नहीं जानती, वो हीरों की खाने ही क्या जो तपना नहीं जानती।

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21- वो मुझे बताना चाहते हैं और मैं सारी दुनिया को बताना चाहता हूँ, वो मुझे देखने में लगे हुए हैं और मैं सारी दुनिया को दिखाना चाहता हूँ।

23- बड़े ख़्वाब नन्ही आँखों के तले पलते हैं, नन्हे क़दम ही बड़े फासले तय करते हैं।

24- अरमान बड़े करने से कुछ नहीं होता उड़ान उन्ही की ऊंची होती है जिनकी कोशिशों के आसमान बड़े होते हैं।

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25- हाथों की हथकड़ियां खोल और ताला लगा जुबां पर, मेहनत ऐसी कर की एक दिन तेरा नाम हो हर जुबां पर।

26- अपने अरमानों के धागे से बना बड़ी आसमान सी चादरें की ना फिर पैर फैलाने में डर लगे और ना पंख फैलाने में।

27- मंज़िल से गुमराह भी कर देते हैं कुछ लोग की हर राही से रास्ता पूछना अच्छा नहीं होता।

28- बिना भूले-भटके यूँ ही ठिकाने नहीं मिलते, डूब जाते है सहारा ढूंढने वाले अक्सर, बिना हाथ पैर मारे किनारे नहीं मिलते।

29- बढ़ते चले गए जो वो मंज़िल पा गए, कहीं ना पहुंचे वो जो पत्थरों से पांव बचाते रह गए।

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30- रास्तों की भी कुछ अलग ही मुश्किलें है मंज़िलों की भी कुछ अलग ही सजा है, मंज़िलों के अपने फायदे हैं सफर का कुछ अलग ही मज़ा है।

31- मंज़िल का प्यार हो तो जूनून सर पर सवार रहना चाहिए, सफर धीमा ही क्यों ना हो पर बरकरार रहना चाहिए।

32- मंज़िल भी मिलेगी मुकाम भी मिलेगा, ढूंढ तो सही भगवान् भी मिलेगा।

33- अजब ये भी किसी और पर नहीं आया, की ताउम्र चले पर घर नहीं आया।

34- ज़िन्दगी मौज से जीने के सारे उसूल गए, पैसा ये पहेली घर का रास्ता भूल गए।

35- कुछ मंज़िल की हसरत में सफर से नफरत कर बैठे, हम खानबदोश हर राह और राहगीरों से मोहोब्बत कर बैठे।

36- मत कोसना अगर मंज़िल पर ज्यादा दिन ना ठहर सकूं बस इतना समझ लेना खानाबदोश हूँ मैं।

37- राही जो झुंड में थे काफी जगह ठहर रहे थे, मैं अकेला था शायद इसलिए देर तक चला और दूर तक चला।

38- अब अकेला ही चलूँगा सफर-ऐ-ज़िन्दगी पर साथ वाले गिराने की कोशिश बहुत करते हैं।

39- रास्ते कहाँ ख़त्म होते हैं ज़िंदग़ी के सफ़र में, मंज़िल तो वहाँ है जहाँ ख्वाहिशें थम जाएँ।।

40- मंज़िलें ना मिली तो क्या गम है रास्तों पर चल कर हमने तजुर्बा कमाया है।

41- मंज़िलें पाँव पकड़ती रही ठहरने के लिए, शौक़ कहता है दो-चार कदम और सही।

42- तलवों पर चल-चल कर छाले पड़ गए, पर मंज़िल के ये प्यासे क़दम रुकने का नाम नहीं ले रहे।

43- मंज़िल की भूख अब और कहाँ थी उसे, वो गरीब दर-बदर की ठोकरें खा कर पेट भर चूका था अपना।

44- ये तक़दीर की सीढ़ियां तुम्हे मुबारक मैं उसूलों पर चल कर ही मंज़िल तक पहुंचूंगा।

45- भले मंज़िलों से मुलाक़ात नहीं हुई, पर रास्तों से पूछ लो हम मुसाफिर बड़े कमाल के थे।

46- मिलना किस काम का अगर दिल ना मिले, चलना बेकार हे जो चलके मंज़िल ना मिले।

47- अलग अलग थे रास्ते लेकिन मंज़िल एक है, सुकून है दिल को की हम मिलेंगे ज़रूर

48- मंज़िल से चाहत हो सकती है ज़माने को, हम मुसाफिर है हमारा रास्तों से राब्ता ज़रा ज़्यादा है।

49- सारी उम्र रास्तों पर चलते रहे आखिर मंज़िल मिली पर फुर्सत नहीं।

50- अंदाज़ कुछ अलग ही हे मेरे सोचने का, सब को मंज़िल का शौक़ है, मुझे रास्ते का।

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